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ममता बनर्जी के पश्चिम बंगाल चुनाव जीतने के क्या चांस हैं? “खेला होबे” – प्रभाकर पटनायक

ममता जी बहुत पॉपुलर हों बंगाल में, जैसे मोदी जी हैं पूरे देश में। लेकिन चुनाव जीतने के लिए संगठन चाहिए। बिना संगठन के कोई भी बड़ा नेता भी चुनाव नहीं जीत सकता। अब भाजपा का संगठन बंगाल में मज़बूत हो चुका है

यही कारण है कि 48 घण्टे भी प्लास्टर पैरों पर नहीं रहा।सलाहकार ने आगाह कर दिया होगा कि खेला हो गया अस्पताल से जल्दी भागो…
वैसे खेला तो मई 2019 लोकसभा चुनावों के दौरान शुरू हो गया था जब चुनाव प्रचार के दौरान उनकी गाड़ी के सामने कुछ बच्चो ने जय श्री राम का नारा लगाया था।

नारा लगाने लगे 5-6 बच्चों पर बुरी तरह क्रोधित होकर ममता बनर्जी अपनी कार से उतर कर अपने सुरक्षाकर्मियों के साथ क्रोध से चीखते चिल्लाते हुए किस तरह उन बच्चों पर झपटी थी। बच्चों द्वारा नारा लगाने की वो घटना बहुत छोटी थी। लेकिन ममता बनर्जी ने अपनी खुद की करतूत से उस घटना को इतना बड़ा रूप दे दिया कि उस घटना के बाद पूरे बंगाल में जयश्रीराम का नारा गूंजने लगा और आज ममता बनर्जी के खिलाफ विद्रोह का सबसे बड़ा राजनीतिक प्रतीक बन गया है।

यदि उस दिन अपनी कार रोक कर ममता बनर्जी मुस्कुराते हुए उन बच्चों के पास तक गयी होती और प्यार से उनके गाल थपथपा कर चली आयी होती तो बात वहीं खत्म हो गयी होती। अगर ममता बनर्जी ने उन बच्चों से मुस्कुरा कर धीरे से “जयश्रीराम” भी कह दिया होता तो भाजपा के हाथ से अपने विरोध वाला एक बहुत बड़ा मुद्दा उसी दिन छीन लिया होता।

लेकिन ऐसा करने के बजाए नेताजी सुभाषचंद्र बोस के 125वें जन्मदिन पर ममता बनर्जी ने वही गलती दोहरायी, ज्यादा फूहड़ता और उद्दंडता के साथ दोहरायी। दरअसल ममता बनर्जी को उस समय तक अपने उस वोटबैंक की नाराजगी की चिंता ज्यादा सता रही थी जिस वोटबैंक का अपने चुनावी मंचों पर खुलकर जिक्र करने, उसका नाम तक लेने से ममता बनर्जी को अब डर लग रहा है। ऐसा करने से वो अब शत प्रतिशत परहेज कर रही है। ममता बनर्जी का वो वोट बैंक भी हर चुनावी मंच पर ममता बनर्जी द्वारा किए जा रहे “राम-राम हरे-हरे” के धुआंधार जप और मंदिरों के ताबड़तोड़ दौरों पर नाक भौं नहीं सिकोड़ रहा।

प्रचण्ड मोदी विरोधी वेबसाइट द्वारा लिया गया कुछ इंटरव्यू पिछले एक सप्ताह से सोशल मीडिया में धूम मचा रहा है। हालांकि इंटरव्यू में सीटों की संख्या नहीं पूछी लेकिन सितंबर से दिसंबर, लगभग 4 महीने तक बंगाल के सभी 294 विधानसभा क्षेत्रों में घूम कर चारों प्रमुख़ पार्टियों के कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और आम जनता से बात करने के साथ ही उनकी टीम ने सभी 294 सीटों की राजनीतिक सामाजिक चुनावी स्थिति की एक सर्वे रिपोर्ट भी तैयार की है। उस सर्वे रिपोर्ट के अनुसार भाजपा को बंगाल में पूर्ण बहुमत मिलने जा रहा है और ममता बनर्जी की TMC की भयंकर राजनीतिक, चुनावी दुर्गति होना तय है।.

बंगाल के चुनावी सर्वे के निष्कर्षों के अनुसार बंगाल की 294 सीटों में से भाजपा को 160 सीटें, TMC को 70 तथा वाम+ कांग्रेस+ फुरफुरा के गठबंधन को केवल 12 सीटें मिलने की बात कही गयी है। ममता बनर्जी का चुनावी ठेकेदार प्रशांत किशोर भी अब खुलेआम यह स्वीकार कर रहा है कि पिछली बार 3 सीटें जीतने वाली भाजपा इसबार 100 सीटें जीत सकती है। 3 से सीधे सौ सीट का आंकड़ा भाजपा के लिए भी अभूतपूर्व राजनीतिक उपलब्धि होगी।

एक अन्य तथ्य भी उपरोक्त स्थिति की पुष्टि करता है
ध्यान रहे कि किसी भी राजनेता की लोकप्रियता का चरम दर्शाने के लिए इस तरह के घटनाक्रम (घायल या बीमार होना) सबसे सटीक अवसर सिद्ध होते हैं। मुख्यमंत्री, विशेषकर ममता बनर्जी सरीखी मुख्यमंत्री की तो बात छोड़िए, मैंने किसी सामान्य विधायक, पार्षद यहां तक कि किसी चर्चित छात्रनेता के साथ हुई दुर्घटना या उसकी बीमारी की खबर पर उनके समर्थकों कार्यकर्ताओं की भीड़ को उस अस्पताल में उमड़ते हुए देखा है जिस अस्पताल में उन्हें भर्ती किया जाता था। अतः मुझे इसबात की पूरी उम्मीद थी कि ममता बनर्जी के सबसे मजबूत राजनीतिक किले कलकत्ता के उस अस्पताल में ममता बनर्जी के समर्थकों का भारी जनसैलाब उमड़ेगा जहां ममता बनर्जी को इलाज के लिए भर्ती किया गया था।लेकिन भारी जनसैलाब की तो बात छोड़िए, उस अस्पताल या उसके बाहर छोटी मोटी भीड़ भी इकट्ठा नहीं हुई। मैंने सारे न्यूजचैनलों को बहुत ध्यान से देखा लेकिन ऐसा कोई दृश्य मुझे नहीं दिखाई दिया।

यह कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं है। कलकत्ता के उस अस्पताल और उसके इर्दगिर्द पसरा सन्नाटा चीख चीख कर सन्देश दे रहा है कि लोगों के मन में ममता बनर्जी के खिलाफ क्षोभ और आक्रोश की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं।

इसलिए मुझे ममता बनर्जी के लच्छन अभी तक ठीक नहीं लग रहे। ऐसा लग रहा है कि ममता पहले चरण तक पहुंचते पहुंचते ताबड़तोड़ कई और गलतियां कर चुकी होगी। ममता बनर्जी पहली गलती यह कर चुकी है कि इस चुनाव को तल्खी औऱ तनाव की जिस ऊंचाई पर ममता बनर्जी ने पहुंचा दिया है उस ऊंचाई पर लड़ना और जीतना तो दूर, उस ऊंचाई पर चुनाव के अंतिम दौर तक टिके रहना ममता बनर्जी के लिए बहुत कठिन हो जाएगा।

मोदी जी ने तो हिंट दे दिया था… “हम तो सबका भला करते है पर अब स्कूटी को नंदीग्राम में ही गिरना था तो हम क्या करें” तो इस बार बंगाल में “खेला होबे” नहीं बल्कि “खेला” हो चुका है।

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