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आलेख – कोरोना संक्रमण एक अबोध बालक की नजर से, कैसा महसूस हो रहा बालमन को उसकी बानगी

कहते है उम्र नहीं समय अनुभव सिखाता है । कुछ चीजें ऐसे घटती है कि लोग अपने जिंदगी मे देखे नहीं रहते । सब ठीक-ठाक चल रहा था पर कुछ माहौल मे हल्की चिंता दिखाई दे रही थी पर लोग इतने भी परेशान नहीं थे । कुछ लोगों ने ऐहितायति कदम उठाने शुरू कर दिए थे उसमे मेरा भी परिवार इसमे से एक था । बात मार्च बीस के आखिरी समय की रही होगी मै मुश्किल से पौने दो साल का ही रहा हूंगा  ।  मुझे तो सब अजीब लग रहा था कुछ समझ में नहीं आ रहा था लोगों ने मास्क पहनना चालू कर दिया था । मुझे भी रंग बिरंगी आकर्षक मिकी डोनाल्ड के चित्र वाले छोटे मास्क पहनाना माता पिता ने चालू कर दिया । हालांकि मै छोटा था मुश्किल से एक साल छै महिने का रहा हूंगा पहले मास्क पहनने से कुछ अजीब लगता था फिर घर के सब सदस्यो को पहनते देख फिर मुझे भी पहनने मे कोई तकलीफ नहीं हुई।  शुरू में तो इसके साथ खेलने मे ही आनंद आ जाता था । कभी उसे खीचना टेढा लगाना यह सब प्रयोग होते रहता था । पर आज तक मै कभी भी मास्क के बगैर बाहर नहीं निकला।  अब जब भी बाहर से आते है तो यह मास्क बरामदे मे ही निकाल देते है । पर इस समय मे मुझे बाहर निकालने घूमने के लिए कुछ कमी सी आ गई इसका कारण मुझे पता नहीं । छुट्टियों में मुझे मेरे आई बाबा जो घुमाने खेलने के लिए बगीचा ले जाते थे वो भी करीब करीब बंद हो गया । शुरू में तो थोड़ा अपार्टमेंट के नीचे खेलने मिलता था वो भी बंद हो गया। कारण कुछ पता नहीं है । अब जो भी खेलना है घर मे ही । फिर एक दिन ऐसा आया कि मेरे को सम्हालने वाली मौसी का भी आना बंद हो गया।  पर मेरी आजी  (  दादी  ) देखभाल करती थी । पर एक दिन मेरी आजी  भी अचानक आजोबा ( दादाजी  ) की तबियत खराब होने के कारण अभनपुर चली गई फिर मेरी मम्मी जो बैंक मे अधिकारी है उसने छुट्टी ली ।  पर एक शैतान बच्चे को किसी को अकेले समहालना कोई मामूली बात नहीं है।  मैरी मम्मी अपना सब काम मेंरे सोने के बाद ही करती थी।  या फिर उठने के पहले । मम्मी का इतने दिनों तक साथ रहना बहुत अच्छा लगा।   फिर मेरे बाबा ( पिताजी ) आजी आजोबा को लेने गये । वे लोग रात ग्यारह बजे आए मै नहीं सोया मुझे उन लोगों का बेसब्री से इंतजार था । फिर क्या था दूसरे दिन से मेरे मम्मी बाबा ड्यूटी चले गये पर मै आजी आजोबा के साथ मस्त धा । मेरे आजोबा ने क्रिकेट का छोटा बैट बाल लाकर दिया।  मै नीचे मे अपने दादा ( बडे भाइयों )  लोगों को क्रिकेट खेलते देखते रहता हू । छोटा होने के कारण मै उनके साथ खेल नहीं पाया । पर आजोबा के साथ खेलने मे बहुत मजा आता है । फिर कुछ दिनों बाद मेरी मम्मी ही बैंक से नहीं आई मेरे को बताया गया कि बैंक मे बहुत काम है मै अपनी मम्मी से वीडियो काल से ही बात करता था । हर वीडियो काल मे मम्मी से जरूर पूछता कब आएगी और अपनी लिस्ट लाने के लिए दे देता था।  पर मेरे बाबा ने भी उस समय छुट्टी ले ली थी फिर आजी आजोबा सबने मेरी देखभाल की।  फिर एक दिन दोपहर को मेरे सोने के बाद शाम को देखता हूं तो मम्मी बैंक से आ गई थी । उस दिन काफी मै खुश हो गया।  मै दो हफ्ते बाद अपने मम्मी से मिल रहा था तो ऐसा लग रहा था कि क्या बताऊं मैने क्या बोला खुशी के कारण याद भी नहीं है । फिर कुछ दिनों बाद मेरे बाबा भी ने अपने को अच्छा नहीं लग रहा है करके अपने को बंद कर लिया। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मै बाबा को मिस कर रहा था । उनसे काफी दूर रहकर जब वो खाना चाय नाश्ता आदि लेते थे तब ही दरवाजे की सुराको से उनको मै देख पाता था । हर समय अपने बाबा से पूछता था कि बाबा आप कब बाहर आओगे  । बस बेटा आ जाऊंगा।  पर मै यह समझ नहीं पा रहा हूं कि मेरे बाबा मेरे पास क्यो नही आ रहे है । एक दिन दोपहर को मेरे सोने के बाद फिर शाम को मेरे बाबा बाहर दिखे भै खुश हो गया उनको लिपट गया । फिर वही पुरानी बाते बता बता कर वो हंस हस कर सुनकर आनंद ले रहे थे । कुछ दिनों तक अच्छा चला सब खुश थे । फिर अचानक एक दिन आजी उस कमरे मे कैद हो गई।  मुझे बताया गया कि आजी की तबियत ठीक नहीं है  । मै उनको अपने बाबा की तरह दरवाजे की सुराखो से देखता था । मै आजी को हर समय बोलता था कि आजी तू मुझे खूब अच्छी लगती है आजी भी बोलती थी कि तुम मुझे बहुत अच्छा लगता है।  दिन भर हर समय आजी के साथ रहने के कारण मेरी उनकी आदत सी हो गई थी।  मेरे को बहुत अजूबा सा लगता था । पर मेरी जिद भी कोई काम की नहीं थी । मुझे हर समय जब यह बता दिया गया कि मुझे उन्हे  दूर से देखना है और बात करना है  तो यह मेरे आदतों मे ही शुमार हो गया था । स्थिति यह थी कि दरवाजे के खुलने की आवाज से ही मै करीब दस फुट से ज्यादा दूरी से उन्हे देखता और बात करता ।  आखिरकार वो दिन भी आ गया आजी भी बाहर हो गई।  फिर वही मेरे लिए खुशी की बात थी कि मेरा अभी कोई दोस्त नहीं है आजी ही मेरी दोस्त है जो हर खेल मेरे साथ खेलती हैं  । अब तो आजोबा भी आ गये  उनके साथ क्रिकेट खेलने मे बहुत मजा आता है।   अब सब  सामान्य है पर वो कौन सी बिमारी है थी मुझे अब भी नहीं मालूम  है।  बस मुझे मालूम है कि अभी भी मुझे मास्क लगाकर बाहर निकलना है  । किसी बाहर की चीजों को छूना नहीं है । बस यह ही कह सकता हू कि इससे बचने के नियम सब मेरे को मालूम है । बस यह कोई और नहीं सिर्फ दो साल नौ माह का अक्षज सौरभ वाघ है मेरे माता-पिता विपुला वाघ और सौरभ चंद्रकांत वाघ और मेरे आजी आजोबा  मनीषा वाघ और डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ है ।
डा . चंद्रकांत  रामचन्द्र वाघ

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