आलेख – कहते है कुछ रिश्ते नीचे भी बनते है एक परिवार उसका जीता जागता उदाहरण, समर्पण के आगे नतमस्तक – cgtop36.com | Cgtop36 Chhattisgarh exclusive news web portal
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आलेख – कहते है कुछ रिश्ते नीचे भी बनते है एक परिवार उसका जीता जागता उदाहरण, समर्पण के आगे नतमस्तक

रिश्ते हर समय उपर से बनकर आते है पर कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं कब बनते है पता भी नहीं चलता।  उपर वाले के तय किए रिश्ते मे कभी कभी कुछ खटास भी आ जाते है पर यह रिश्ता पवित्रता लिए हुए रहता है । मै आपको सन तिरासी और चौरासी के आसपास करीब अड़तीस साल पहले ले जाना चाहता रहा हू।  अभनपुर के  रासतो मे पांच छह लोग मिलकर एक साथ चलते हुए हर समय नजर आ जाते थे ।  यह लोग थे इंजीनियर जिनका पूरा डिवीजन ही पिपरिया से अभनपुर स्थानांतरित किया गया था। ज्यादा लोगों से परिचित नहीं थे पर यह लोग ही अपने मे काफी थे ।  पर कुछ समय बाद मै  भी उनका हिस्सा बन गया ।  क्योकि सिंचाई विभाग के कर्मचारी मेरे मरीज थे । मै उनका पारिवारिक चिकित्सक था । फिर आगे मै इनके एसडीओ साहेब वार्ष्णेय और सब इंजीनियर अरूण गुप्ता जी का पडौसी बना । मेरा घर बीच मे और इन दोनों के घर मेरे आजू-बाजू थे । उल्लेखनीय है कि स्व . वार्ष्णेय साहब को भी कोई बच्चा नहीं था तो उन्होंने अपने भाई की लडकी को गोद लिया हुआ था।  वहीं स्व. अरूण गुप्ता जी को शादी के पांच छह साल मे कोई संतान नहीं थी तो उन्होंने भी अपने बड़े भाई के लडके जिसे धीरू बोलते थे उसे घर ले आए।  ढाई तीन साल का धीरू इनके लिए नायाब था । वहीं इनके भाई भी चित्रकूट मे किराना का व्यापार करते थे ।   उन्हे भी यह लगा कि यह लडका इनके पास रहेगा तो शिक्षित हो जाएगा  ।   आखिरकार वह लडका अपने चाचा के साथ ही रहने लगा।  उस समय काम बहुत था गुप्ता जी समय नहीं दे पाते थे तो बडे बाबू बाला साहब (आई बाला) हर शाम उस बच्चे को सायकल के सामने वाले हिस्से में बैठाकर घुमाते थे । उनके रोज की दिनचर्या थी।  छुट्टी के दिन तो दोनों समय हो जाता था ।  यह प्यार बहुत ज्यादा हो गया  ।   फिर गुप्ता जी को भी  कुछ सालो बाद लडका हुआ अंकुर पर धीरू को भी अपने पास ही रखा । बाला साहब की दिनचर्या मे अब दोनों बालक आ गये । वैसे ही इनके पारिवारिक रिश्ते बन चुके थे । बाला साहब अकेले थे किसी ने भी उनसे परिवार के बारे में कभी किसी ने नहीं पूछा ।  फिर गुप्ता जी का ट्रांसफर जगदलपुर हो गया अभनपुर छूट  गया । पर बाला साहब और हम लोगों से संपर्क बना रहा । फिर बच्चो की पढाई के खातिर उन्होंने रायपुर मे ही रहने का फैसला किया।   न्यू शांतिनगर मे मकान बनवा लिया।  जब राज्यो का बंटवारा हुआ तो उनहे मध्यप्रदेश मिला और सीधी जिले में पोस्टिंग हुई। सब ठीक था फिर गुप्ता जी को कैंसर हुआ  बडे बाबू हर समय साथ रहे  और दुर्भाग्य से गुप्ता जी को बचाया नहीं जा सका । बच्चे छोटे थे उस समय बडे बाबू सब कुछ छोडकर उन्होंने अपना पूरा सहयोग दिया।  फिर उनके हर मसलों पर बडे बाबू की राय ही मायने रखती थी ।  फिर शादी जैसे अहम मामलों भी बडे बाबू ही सामने रहते थे । धीरू भी MTech इंजीनियर बन गया, GATE एग्जाम में उसने पूरे देश में 12 स्थान पाया, पहले बैंगलोर में फिर अब दुबई में नौकरी की। अंकुर ने भी बी टेक किया फिर एम टेक किया फिर पी एच डी की  ।  अब वो एनआईटी मे प्राध्यापक है।  बडे बाबू (आई बाला) रिटायर हुए फिर वो अकेले अभनपुर मे ही रहने लगे । अकेले पन की परेशानी भी रहा करती थी पर हर समय सायकल से ही जाया करते थे ।  पता नहीं क्यो वो अपनो के यहां  नहीं  गए । उम्र भी साथ नहीं दे रही थी पर बीमार होने लगे थे ।  फिर आखिर कार 2017 में अंकुर ने उन्हे अपने साथ रहने के लिए मना लिया और अच्छा चिकित्सक को दिखवाकर इलाज कराया बडे बाबू बेहतर हो रहे थे।  फिर भाभी भी बिमार रहती थी उन्हे भी देखना पडता था।   घर थोड़ा छोटा पडता था तो फिर फस्ट फ्लोर बनवाया।  सब ठीक चल रहा था जैसे मुझे अंकुर ने बताया कि बडे बाबू को, भाभी को, अंकुर की पत्नी और बच्चे सबको कोविड हो गया । बड़े बाबू को medishine हॉस्पिटल में पहले भेजा पर वेंटीलेटर ना होने के कारण उन्होंने एडमिट नही किया तो उन्हे इंडोर स्टेडियम में भर्ती किया, भाभी को एम्स में मे और स्वंय एमएमआई मे भर्ती हुआ। पता नहीं कैसे मैनेज किया होगा  । उसकी स्थिति बेहतर हुई तो भाभी जी नहीं रही फिर प्रशासनिक कमियों के कारण बडे बाबू का कुछ नहीं चल रहा था, रोज उन्हे ढूढने के लिए अलग अलग अधिकारियों से अंकुर बात कर रहा था, अंततः फिर एक दिन नगर निगम से बडे बाबू नहीं रहे पता चला।  फिर उसने बडे बाबू जो इस्लाम के अनुयायी थे फिर उसने समाज के सहयोग से रीति-रिवाजों से बडे बाबू को स्वयं कब्रिस्तान जा के सुपुर्दे खाक के सारे अंतिम क्रियाएं करवाई। उनका एक भाई अमेरिका मे और एक बहन भी अमेरिका मे और एक बहन पाकिस्तान मे थी उनकी अनुमति से उन्हे वीडियो काल के माध्यम से उन्हे शामिल कर  अंतिम संस्कार किया।  अचानक दोनों का जाना उसके लिए बहुत बडी क्षति है ।  उल्लेखनीय है कि जब यह सब घट रहा था उसके साले की शादी दिल्ली में थी उसमे जाना था ।  पर अब शादी भी कैंसल हो गई ।  कहते है कुछ रिश्ते नीचे भी बनते है यह परिवार उसका उदाहरण हैं।   बडे बाबू को अपने परिजनों से ज्यादा लगाव आत्मीयता इन लोगों से थी ।  दोनों ने इन संबंधों को खूब निभाया । मै तो यह पहले ही लिखने वाला था पर रूक गया  ।  यह होता है सदभाव बस इतना ही डा . चंद्रकांत रामचन्द्र वाघ

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